श्मशान पर दिखी इंसानियत और सौहार्द की मिसाल


मुजफ्फरनगर। कोरोना काल में जहां अपने ही अपनों से दूर हो रहे हैं, वहीं इंसानियत को जिंदा रखने वाले मंजर भी नजर आ रहे हैं। 

मजहब की दीवारों को लांघकर, आपसी रिश्तों को तरजीह देती इंसानियत का ऐसा ही मंजर आज पत्रकार साथी शरद शर्मा के छोटे भाई अनुभव शर्मा के अंतिम संस्कार के समय नजर आया। मजहब की बंदिशों से दूर आपसी रिश्तों की ऐसी हकीकत देखने को मिली जो अब एक मिसाल ही नजर आती है। अनुभव के साथ लंबे समय से काम कर रहे शहरवासी मौ युनूस अंतिम संस्कार के समय अपने को रोक न सके तथा भाई की भांति चिता के पास मौजूद रहे और हाथ बटाते रहे। उनकी आंखों से टपकते आंसू आपसी रिश्तों और भाईचारे की बुनियाद को बंया कर रहे थे।

कोरोना के इस संकट ने यह भी दिखा दिया है कि आपसी रिश्तों को कभी खत्म न होने दें, छोटी छोटी बातों को नजरअंदाज करते हुए एक दूसरे के साथ इंसानियत और भाईचारे की डोर को मजबूती के साथ पकडकर चलना चाहिए। जहाँ एक दूसरे की गलती लगे उसे मान लेना चाहिए, स्वीकार कर लेना चाहिए। यह समाज है एक दूसरे से मिलकर बना है। आपसी रिश्ते, ताल्लुकात, भाईचारा, दोस्ती ऐसे शब्द हैं जो मजहबी दीवारों को तोडकर भी एक दूसरे के करीब आते हैं। जब हिंदू और मुसलमान से अलग हटकर ऐसे नजारे सामने आते हैं तो इंसानियत और भाईचारे का रूतबा बुलंद होता दिखाई देता है और समझ में आता है कि इंसान ही इंसान के काम आता है। काश इस जज्बे को समाज के सभी वर्ग समझ पाएं।

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