Saturday, March 6, 2021

किसान आंदोलनः कृषि कानूनों को लेकर फैला रहे भ्रमः अशोक बालियान

 मुजफ्फरनगर। पीजेंटस वेल्फेयर एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक बालियान ने देश की कृषि कानूनों को लेकर चल रहे किसान आंदोलन को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि कानूनों को पढे और समझे बिना कृषि कानूनों को लेकर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है और बिना सोचे समझे और पढे ही इनका विरोध हो रहा है।

किसान नेता अशोक बालियान ने कहा कि देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ बैठे किसानों का आन्दोलन 100वे दिन भी जारी है। 26 नवंबर 2020 को पंजाब और हरियाणा से किसान दिल्ली की सीमाओं पर आये थे, उसके बाद 27 नवंबर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसानों ने गाजीपुर बाॅर्डर पर अपनी आन्दोलन शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा कि दिल्ली में 1 दिसंबर 2020 से सरकार और किसानों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ था। इससे पहले पंजाब में आन्दोलन चलते भी सरकार और किसानों के बीच वार्ता हुई थी। किसानों और सरकार के बीच कुल 11 बैठकों में पहला दौर की वार्ता 14 अक्टूबर 2020 को हुई थी और इस मीटिंग में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की जगह कृषि सचिव आए थे। किसान संगठनों ने मीटिंग का बायकाॅट कर दिया था, क्योकि किसान नेता कृषि मंत्री से ही बात करना चाहते थे। इसके बाद दूसरा दौर की वार्ता 13 नवंबर 2020 को हुई थी। इस मीटिंग में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान संगठनों के साथ मीटिंग की थी और 7 घंटे तक बातचीत चली, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला था। तीसरा दौर की वार्ता 1 दिसंबर 2020 को हुई थी। तीन घंटे बात हुई थी। सरकार ने एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन किसान संगठन तीनों कानून रद्द करने की मांग पर ही अड़े रहे थे। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) इस मीटिंग में शामिल नही थी उसको शाम चैथे दौर की वार्ता 3 दिसंबर 2020 को हुई थी। और साढ़े 7 घंटे तक बातचीत चली थी। सरकार ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। किसानों का कहना था कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी देने के साथ तीनों कानून भी रद्द करे।

बालियान ने कहा कि इसके बाद 5वें दौर की वार्ता 5 दिसंबर 2020 को हुई थी। इस वार्ता में सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लिखित गारंटी देने को तैयार हुई, लेकिन किसानों ने साफ कहा कि कानून रद्द करने पर सरकार हां या ना में जवाब दे। 6वें दौर की वार्ता 8 दिसंबर 2020 को हुई थी। किसान संगठनों द्वारा भारत बंद की काॅल के दिन ही गृह मंत्री अमित शाह ने किसान संगठनों के साथ बैठक की थी। अगले दिन सरकार ने 22 पेज का प्रस्ताव किसान संगठनों को दिया था, लेकिन किसान संगठनों ने इसे ठुकरा दिया था। 7वें दौर की वार्ता 30 दिसंबर 2020 को हुई थी। इस मीटिंग में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान संगठनों के 40 प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। किसान नेताओं की कुल चार माँगों में दो माँगो पर सहमति बनी, लेकिन दो माँगों पर मतभेद कायम रहा। 8वें दौर की वार्ता 4 जनवरी 2021 को हुई थी। और 4 घंटे चली बैठक में किसान नेता कानून वापसी की मांग पर अड़े रहे थे। मीटिंग खत्म होने के बाद कृषि मंत्री ने कहा किसान नेताओं का रवैया नकारात्मक रहा। 9वें दौर की वार्ता 8 जनवरी 2021 को हुई थी। यह बातचीत बेनतीजा रही थी। किसानों ने बैठक में तल्ख रुख अपनाया था। बैठक में किसान नेताओं ने पोस्टर भी लगाए थे, जिन पर गुरुमुखी में लिखा था कि मरेंगे या जीतेंगे। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसान संगठनों की चार में से दो मांगें सरकार ने मान चुकी है, लेकिन दो मांगों पर मामला अटका हुआ है। 10वें दौर की वार्ता 15 जनवरी 2021 को हुई थी। यह मीटिंग करीब 4 घंटे चली थी। और किसान नेता कानून वापसी पर अड़े रहे थे। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों से अपील करते हुए कहा कि हमने आपकी कुछ मांगें मानी हैं। कानून वापसी की एक ही मांग पर अड़े रहने के बजाय आपको भी सरकार की बातें माननी चाहिए।

 उन्होंने कहा कि 11वें दौर की वार्ता 22 जनवरी 2021 को हुई थी। यह मीटिंग 3 धंटे चली थी। केंद्र सरकार ने किसान नेताओं के सामने प्रस्ताव रखा था कि डेढ़ साल तक कृषि कानून लागू नहीं किए जाएंगे और वो इस संबंध में एक हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में पेश करने को तैयार है। इसके अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बातचीत के लिए नई कमेटी का गठन किया जाएगा। कमेटी जो राय देगी, उसके बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य और कानूनों पर फैसला लिया जाएगा। किसान नेता यदि इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति देंगे तो सरकार वार्ता की तिथि निर्धारित करेगी। उनका कहना है कि देश में किसानों के मन में कृषि कानूनों के प्रति भय और शंका भर दी गई है। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन किसानों से लगातार संवाद बनाकर इन कानूनों के प्रति जागरूक करने का कार्य कर रही है। और उनसे समाधान निकालने पर राय भी ले रही है। क्योकि कुछ किसान संगठनों की हठधर्मिता ने कृषि, किसान और देश को पीछे धकेल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समिति बना कर उसे समझने की व्यवस्था बनाई, लेकिन आंदोलनरत किसान नेताओं उससे भी अपनी असहमति जताकर यह अवसर खो दिया है। जबकि यह समिति अपना काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने तीन कानूनों के अमल पर रोक लगा रखी है। अशोक बालियान ने कहा कि आंदोलनरत अधिकतर किसान नेता अपने इन्टरव्यू में तीनों कानूनों के कौनसे प्रावधान काले है उनको नही बताते है। इसी तरह आजतक देश की जनता को विपक्षी दलों के नेताओं ने यह भी यह नही बताया कि इन कानूनों में किसान विरोधी प्रावधान कौनसे है। देश के प्रधानमन्त्री व् कृषि मंत्री संसद में भी विपक्षी दलों के नेताओं से यह सवाल पूछ चुके है, लेकिन संसद का रिकार्ड बताता है कि उन्होंने वहाँ भी इस सवाल का उत्तर नही दिया। 

उनका कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कृषि कानूनों का बिना पढ़े ही विरोध हो रहा है। नए कानूनों को लेकर किसानों के मन में झूठे डर बैठा दिए हैं, जबकि ये कानून किसानों के लिए बहुत बड़े बाजार का दरवाजा और मौके खोल रहे हैं। किसानों की कृषि उपज न्यूनतम बिक्री मूल्य से नीचे न बिके, इसके लिए किसानों की उपज का चीनी की तरह न्यूनतम बिक्री मूल्य निर्धारित होना चाहिए। बालियान ने कहा कि यदि इन कानूनों को ठीक से पढ़ा जाता तो आंदोलनरत किसान नेता सरकार के सामने किसान हित की ही मांग रखते जैसे नए कानून आने के बाद मंडी से बाहर फसल की खरीद पर आढत व टैक्स नही है। ऐसे में मंडी के अंदर टैक्स टैक्स फ्री की मांग रखनी चाहिए थी। इस प्रकार सरकार और असंतुष्ट किसानों नेताओं के बीच अब तक 11 दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि सरकार किसान संगठनों के साथ वार्ता करने के लिए तैयार है लेकिन उन्होंने अभी हमारे प्रस्ताहव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। हम किसान संगठनों से अपील करते है कि उन्हें अपनी मांगों पर पुनरवलोकन कर किसानों की वास्तविक समस्याओं के साथ सरकार से वार्ता करनी चाहिए।


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