आलोक स्वरूप और अनिल स्वरूप ने एसडीएम के आदेश को बताया एक पक्षीय और नियम विरुद्ध


मुजफ्फरनगर । निजी स्वामित्व भूमि को शत्रु संपत्ति मानते हुए उक्त भूमि को राज्य सरकार में दर्ज किये जाने से सम्बंधित प्रकरण में पिछले कुछ दिनों कुछ समाचार पत्रों तथा वाट्सअप न्यूज़ ग्रुप में प्रकाशित समाचार/लेख की वस्तु स्थिति से अवगत कराते हुए प्रमुख समाजसेवी आलोक स्वरूप और अनिल स्वरूप ने आज एसडीएम सदर के आदेश को नियम विरुद्ध और एक पक्षीय बताया। 

उन्होंने कहा कि एक आदेश उप जिलाधिकारी सदर मुज़फ्फरनगर द्वारा दिनांक 31/12/2020 को पारित हुआ है जिसमे उन्होंने आदेश किया है कि “ग्राम-युसुफपुर बाहर हदूद के खाता स. 3 खसरा न. 37, 39, 43, 44, एवं 45 हे०, ग्राम-युसुफपुर अन्दर हदूद के खाता स. 7 खसरा न. 182, 202, 361, 363, 364, 370, 374, 375, 376, 378 हे०, ग्राम-युसुफपुर नॉन जेड०ए० के खाता स. 5 खसरा न. 365, 366, खाता सं. 7 के खसरा न. 371, 372, 373, 377, 379, 382, 383, व 384 हे० तथा खाता स. 12 खसरा न. 203 व 204 हे० से वर्तमान प्रविष्टि को धारा-38(5) उ०प्र० राजस्व संहिता, 2006 के अन्तर्गत निरस्त कर भूमि को राज्य सरकार में दर्ज किया जाता है”। ये आदेश निराधार है, न्यायहित में नहीं है तथा नियम विरूद्ध है। 

सर्वप्रथम उप जिलाधिकारी सदर के आदेश में उल्लेखित है कि “नोटिस सं. 22 दिनांक 15/06/2020 विपक्षी/प्रतिवादी संख्या 1-आलोक स्वरुप अनिल स्वरुप पुत्रगण विनोद कुमार सिंह के द्वारा नोटिस की प्रति प्राप्त न करने के कारण उक्त नोटिस की प्रति उनके दक्षिण मुहाने पर चस्पा की गयी व प्रतिवादीगणों को जवाब व साक्ष्य प्रस्तुत करने हेतु प्रयाप्त अवसर प्रदान किया गया लेकिन उनके द्वारा कोई  जवाब या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया”  जबकि वास्तविकता यह है कि आलोक स्वरुप जी ने नोटिस की तामील करते हुए उप जिलाधिकारी सदर को एप्लीकेशन दिनांक 27/06/2020 प्रेषित करते हुए अवगत कराया था “कि कोरोना महामारी के मद्देनजर तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने टीवी न्यूज़ के माध्यम से विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को LOCKDOWN 1.0 के मद्देनजर आवागमन सूक्ष्म रूप में करने के लिए सचेत किया है I इसलिए कोरोना महामारी को देखते हुए तथा LOCKDOWN 1.0 को दृष्टिगत लेते हुए मैं घर से कही भी बाहर नहीं जा रहा हूँ अत: जुलाई-अगस्त कि तिथि नियुक्त करने कि कृपा करे” किन्तु आजतक भी सुनवाई कि नियत तिथि से अवगत नहीं कराया गया है। ये एप्लीकेशन / पत्र रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेजी गयी थी तथा उप जिलाधिकारी कार्यालय को प्राप्त हो गयी थी I अत: यह कहना कि नोटिस पर आलोक स्वरुप आदि ने जानबूझकर नोटिस प्राप्त नहीं किया और अपना पक्ष नहीं रखा, बिलकुल बेबुनियाद और निराधार है I ये आदेश एक पक्षीय आदेश है तथा कोरोना महामारी में एक पक्षीय आदेश पारित करना, वो भी समुचित सुनवाई किये बिना किसी भी दशा में न्यायोचित नहीं है I उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने भी समय-समय पर दिशा निर्देश दिए है कि “ADVERSE ORDER” कोरोना काल में अपेक्षित नहीं है I यह आश्चर्य का बिंदु है कि इस कोरोना महामारी में जहाँ पूरा देश की जनता एकजुट होकर आवागमन कम से कम करके (विशेष रूप से वरिष्ठ व बीमार नागरिक) महामारी से लड़ते हुए जीवन यापन कर रहे है ऐसी स्थिति में कोरोना काल में नोटिस निर्गत करना और कोरोना काल में ही मात्र 6 महीने के अन्दर एक पक्षीय आदेश पारित करना बड़ा ही विचारणीय विषय है I इस न्यायालय में कोरोना काल से भी पहले के वर्षों पुराने वाद लम्बित चले आ रहे हैं जिनका निस्तारण नहीं हो पा रहा है तथा प्रश्नगत वाद का निस्तारण मात्र 6 महीने में एक पक्षीय आदेश द्वारा करना एक सामान्य प्रक्रिया प्रतीत नहीं होती है I इससे पूर्व भी एक नोटिस न. 178 दिनांकित 27/01/18 को तहसीलदार सदर द्वारा, अज्ञात शिकायतकर्ता के आधार पर केवल हमको निर्गत किया गया था तथा 3 साल व्यतीत होने के बाद भी उक्त नोटिस न. 178 का आदेश आज तक पारित नहीं हुआ है जिसमे हमने प्रत्यावेदन दे दिया था परन्तु सुनवाई की तिथि आज तक नहीं लगी है I शत्रु सम्पत्ति अधिनियम में एक और नोटिस न. 371 दिनांकित 13/04/18 प्रभारी शत्रु सम्पत्ति से भी अज्ञात शिकायतकर्ता के आधार पर केवल हमको प्रेषित हुआ था जिस पर हमने अपना प्रत्यावेदन 3 साल पहले ही दाखिल कर दिया था परन्तु इस नोटिस में भी कोई सुनवाई की तिथि आज तक नियुक्त नहीं हुई है I 

तहसीलदार सदर द्वारा प्रेषित नोटिस न. 178 व प्रभारी शत्रु सम्पत्ति द्वारा प्रेषित नोटिस न. 371 आज तक लंबित चले आ जबकि यह जगजाहिर है कि नोटिस निर्गत होने के बाद अधिकारी के पास दो ही विकल्प होते है या तो नोटिस को CONFIRM किया जाये या नोटिस को WITHDRAW किया जाये । नोटिस को लंबित रखने का कोई भी प्रावधान किसी भी नियम में नहीं है I सम्बंधित अधिकारी भी भली-भांति जानते है कि विवादित भूमि शत्रु सम्पत्ति नहीं है तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली ने विवादित भूमि का स्वामित्व सरकार का नहीं माना है निजी स्वामित्व माना है I मैंने 40-50 रिमाइंडर भी भेजे है तथा 2 वर्ष पूर्व आपके माध्यम से प्रेस कांफ्रेंस भी की थी जिसमे मैंने अपेक्षा की थी कि शत्रुसम्पत्ति सम्बंधित नोटिसों की सुनवाई की जाये व शीघ्र-अतिशीघ्र उनका निस्तारण किया जाये जो आज तक नहीं हुआ है। 

इसके विपरीत अब वर्तमान में एक नया नोटिस राजस्व अधिनियम के अंतर्गत प्रेषित कर दिया जिसका एक पक्षीय आदेश भी पारित कर दिया व विवादित भूमि जो अब तक 570 बीघे पर केन्द्रित थी अब इस नए नोटिस सं. 32 से मात्र 51 बीघे लगभग रह गयी है I यदि ये शत्रु सम्पत्ति है तो पूरी सम्पत्ति अर्थात 570 बीघा शत्रु सम्पत्ति घोषित होनी चाहिये न कि मात्र 51 बीघे I यह तो तर्क है कि पूरी विवादित भूमि नवाब साहब की शत्रु सम्पत्ति है या पूरी नहीं है मात्र 10% का छोटा भाग शत्रु सम्पत्ति होना सम्भव नहीं है I मैंने स्वयं अधिकारियों को लिखित में अवगत कराया था कि यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली के आदेश दिनांक 18/11/1953 से वो संतुष्ट नहीं है तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में रिव्यु पेटीशन दायर कर सकते है किन्तु मेरे लिखित सुझाव के बावजूद आज तक माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में रिव्यु पेटीशन सरकार के द्वारा दायर नहीं की गयी। 

नोटिस न. 32 में मूल बिंदु CUTTING, OVERWRITING खतौनी के खसरा नम्बरों में किया जाना दर्शाया गया है I यह तो जगजाहिर है कि खसरा अधिकारी के पास / विभाग की कस्टडी में रहता है तथा आम जनमानस खसरो में स्वयं CUTTING, OVERWRITING नहीं कर सकता है I अत: सर्वप्रथम जिस अधिकारी / कर्मचारी ने संभवत: CUTTING, OVERWRITING की है उससे स्पष्टीकरण मांगना चाहिये कि उसने किस आधार पर CUTTING, OVERWRITING की थी I CUTTING, OVERWRITING किया जाना एक गंभीर विषय है तथा किसी भी सरकारी दस्तावेज में यदि करोड़ो रूपये की सम्पत्ति की हेरा-फेरी हुई है तो नियमानुसार सर्वप्रथम FIR दायर की जानी चाहिये जिससे इस षड्यंत्र का पर्दाफाश हो सके। यह भी उल्लेखनीय है कि मात्र खसरो में प्रविष्टि से कोई सम्पत्ति मालिक नहीं बनता है बैनामा आदि होने के बाद खसरो में प्रविष्टि सामान्य दाखिल ख़ारिज की प्रविष्टि होती है अहम् दस्तावेज बैनामा इत्यादि होता है जो रजिस्ट्रार कार्यालय में रिकॉर्ड में रहता है अत: मूल बैनामा आदि का अध्यन करना जरुरी है न कि केवल खसरो का। नोटिस न. 32 में केवल खसरो का जिक्र किया गया है और कोई भी उल्लेख नहीं है कि मूल दस्तावेज जैसे कि बैनामा आदि में भी CUTTING/OVERWRITING की गयी है अथवा नहीं I जब मूल दस्तावेजो में कोई CUTTING/OVERWRITING नहीं है जो कि अहम् सरकारी दस्तावेज है तो मात्र खसरो में CUTTING/OVERWRITING होने से ऐसा आदेश पारित करना नियम विरूद्ध है। यह भी उल्लेखनीय है कि नोटिस न. 32 केवल मुझे तथा मेरी काबिज सम्पत्ति पर ही दिया है। वर्तमान में मैं मात्र 12-13 बीघे पर ही काबिज हूँ जबकि आदेश में जो अन्य भूमि दर्शायी है उसमे कई कॉलोनियां विकसित है तथा सैकडों परिवार काबिज है तथा सम्पत्ति स्वामी है। जब नोटिस में खसरा न. -37,39,43,44,45, 182, 202, 361, 363, 364, 370, 374,375, 376, 378, 365,366, 371, 372, 373, 377, 379, 382,383, 384,203,204 उल्लेखित है तो न्यायहित में वर्तमान में सभी कब्जाधारियो / सम्पत्ति मालिको को चिन्हित कर सबको नोटिस निर्गत किया जाना चाहिये था जिससे वो सभी अपना पक्ष आपके समक्ष अपनी सम्पत्ति के बारे में रखते। केवल मेरे विरूद्ध EX-PARTY ORDER बिना किसी और को पक्षदार बनाये नोटिस देना न्यायहित में नहीं है ऐसे में न्यायहित में या तो सभी उपरोक्त खसरो के सभी कबिजो को नोटिस निर्गत हो या सार्वजानिक सूचना समाचार पत्रों के माध्यम से प्रकाशित करानी चाहिए। 

यह भी उल्लेखनीय है कि यदि CUTTING, OVERWRITING हुई भी है जो एक विवाद का बिंदु है तो भी CUTTING, OVERWRITING से पूर्व सरकार का नाम भूमि में इन्द्राज नहीं था तथा प्राइवेट पार्टियो कि प्रविष्टियाँ है अत: CUTTING, OVERWRITING से किसी के अधिकार प्रभावित होंगे वो निजी व्यक्ति है जिसमे सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती तथा प्राइवेट पार्टियो के विवाद के लिए सिविल कोर्ट का प्रावधान है। माननीय उच्च न्यायालय ने अपने आदेश Jitendra Bahadur Singh VS State of U.P and 5 Others दिनांकित 04/09/2015 में इसका उल्लेख किया है जिसके बाद मुख्य सचिव ने एक G.O न. 650(1)/एक-9-15-रा-9 दिनांक 16/09/2015 को जारी किया था जिसमे स्पष्ट रूप से उप जिलाधिकारी / अन्य अधिकारियों को प्रतिबंधित किया था कि निजी वाद में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये। 

यदि CUTTING, OVERWRITING हुई है तो भी जिस निजी व्यक्ति का नाम प्रभावित हुआ है तो उसके नाम से पुन: प्रविष्टि होने से भी सरकार में सम्पत्ति किसी भी दशा में दर्ज नहीं हो सकती। सर्वप्रथम विवादित भूमि शत्रु सम्पत्ति घोषित होनी चाहिये तब सरकार का हस्तक्षेप करना न्यायोचित  होगा। सरकार ने स्वयं विवादित भूमि को कभी नवाब साहब की या शत्रु सम्पत्ति नहीं माना है। और ये भी अहम् है कि सरकार ने स्वयं इस विवादित भूमि के कुछ भाग का अधिग्रहण किया था और उसकी अधिग्रहण राशी लाला दीपचंद को अदा की थी। अधिग्रहण राशी भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ही तय की थी I माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली का आदेश स्टेट ऑफ़ यूपी VS लाला दीप चन्द व अन्य दिनांकित 16/1/1980 का है। 

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