सकट चतुर्थी व्रत पूजा का मुहूर्त

 *सकट चौथ व्रत कथा और शुभ पूजा मुहूर्त*

हिंदू शास्त्र के अनुसार माघ माह में आने वाली सकट चौथ का विशेष महत्व है। इस दिन मां अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए कामना कर भगवान गणेश की उपासना करती हैं, और दिन भर निर्जला उपवास करती हैं। सकट चौथ का यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है, क्योंकि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सकट के दिन ही भगवान गणेश के जीवन पर बहुत बड़ा संकट आया था। इस साल सकट चौथ रविवार के दिन 31 जनवरी को है।  ऐसी मान्यता है कि, इस दिन जो भी माता भगवान गणेश को स्मरण कर पूरे विधि-विधान के साथ व्रत करती है, उसकी संतान हमेशा निरोग रहती है। भगवान गणेश की उसपर विशेष कृपा होती है। 


सकट चौथ का पूजा मुहूर्त

सकट चौथ-  31 जनवरी, दिन – रविवार (2021)


चंद्रोदय का समय- 8 बज-कर, 41 मिनट


पूजा विधि

प्रात:काल उठकर स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें। 

भगवान गणेश की पूजा करें।

पूजा के वक्त माता लक्ष्मी की भी मूर्ति ज़रुर रखें।

दिनभर निर्जला उपवास करें।

रात में चाँद को अर्घ्य दें, गणेश जी की पूजा कर फिर फलहार करें।

संभव हो तो फलहार में केवल मीठा व्यजंन ही खाए, सेंधा नमक का भी सेवन ना करें।

इस दिन की पूजा में गणेश मंत्र का जाप करना बेहद फलदाई बताया गया है। गणेश मंत्र का जाप करते हुए 21 दुर्वा भगवान गणेश को अर्पित करना भी बेहद शुभ होता है। 

इसके अलावा भगवान गणेश को लड्डू बेहद पसंद होते हैं। ऐसे में इस दिन की पूजा में अन्य भागों के साथ आप बूंदी के लड्डू का भोग लगा सकते हैं। लड्डू के अलावा इस दिन गन्ना, शकरकंद, गुड़, तिल से बनी वस्तुएं, गुड़ से बने हुए लड्डू और घी अर्पित करना बेहद ही शुभ माना जाता है।

सकट चौथ का महत्व और भगवान गणेश की पूजा का विधान

हिंदू धर्म में किए जाने वाले सभी व्रत और त्योहार किसी ना किसी देवी देवता से संबंधित होते हैं। ठीक उसी तरह सकट चौथ का यह व्रत भगवान गणेश से संबंधित माना गया है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान बताया जाता है। मान्यता है कि, जो कोई भी व्यक्ति सकट चौथ का व्रत करता है उनके जीवन में भगवान गणेश सुख, समृद्धि का वरदान देते हैं। इसके अलावा यह व्रत  संतान की लंबी उम्र की कामना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। 

सिर्फ इतना ही नहीं यदि किसी बच्चे के जीवन में पढ़ाई से संबंधित कोई विघ्न, बाधा या परेशानी आ रही हो तो माताओं द्वारा किया जाने वाला यह व्रत बच्चे की उस तकलीफ़ को या परेशानी को भी दूर करता है।  ऐसे संतान पर भगवान गणेश जी की कृपा और आशीर्वाद ताउम्र बना रहता है। इस दिन चंद्रमा की पूजा से पहले तक माताएं अपने बच्चों के लिए निर्जला उपवास रखती हैं और इस दिन के भोग में भगवान गणेश को तिल, गुड़, गन्ना इत्यादि चढ़ाया जाता है।

सकट चौथ पहली व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सकट चौथ के दिन भगवान गणेश पर सबसे बड़ा संकट आकर टला था, इसलिए इस दिन का नाम सकट चौथ पड़ा है। कथा के अनुसार एक दिन मां पार्वती स्नान करने के लिए जा रही थी। तभी उन्होंने अपने पुत्र गणेश को दरवाज़े के बाहर पहरा देने का आदेश दिया और बोली, ‘जबतक मैं स्नान करके ना लौटी किसी को भी अंदर आने की इजाज़त मत देना।’ भगवान गणेश भी मां की आज्ञा का पालन करने लगे और बाहर खड़े होकर पहरा देने लगे। 

ठीक उसी वक्त भगवान शिव माता पार्वती से मिलने पहुंचे।  परंतु गणेश जी ने भगवान शिव को दरवाज़े के बाहर ही रोक दिया । ऐसा देख शिव जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से वार कर गणेश जी की गर्दन धड़ से अलग कर दी। इधर पार्वती जी ने बाहर से आ रही आवाज़ सुनी तो वह भागती हुई बाहर आईं, पुत्र गणेश की कटी हुई गर्दन देख अत्यंत घबरा गई, और शिव जी से अपने बेटे के प्राण वापस लाने की गुहार लगाने लगी। शिव जी ने माता पार्वती की आज्ञा मानते हुए, गणेश जी पर एक हाथी के बच्चे का सिर लगाकर उन्हें पुनः जीवन दान दे दिया और उसी दिन से सभी महिलाएं अपने बच्चों की सलामती के लिए गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगी। 

सकट चौथ की दूसरी कथा

एक समय की बात है, एक नगर में एक कुम्हार रहता था, पर एक दिन जब उसने बर्तन बनाने के बाद आवा लगाया तो वह नहीं पका। कुम्हार परेशान होकर राजा के पास गया और पूरी बात बताई। राजा ने राज्य के राज पंडित को बुलाकर कुछ उपाय सुझाने को बोला, तब राज पंडित ने कहा कि, यदि हर दिन गांव के एक-एक घर से एक-एक बच्चे की बलि दी जाए तो रोज आवा पकेगा। राजा ने आज्ञा दी की पूरे नगर से हर दिन एक बच्चे की बलि दी जाए। 

कई दिनों तक ऐसा चलता रहा और फिर एक बुढ़िया के घर की बारी आई, लेकिन उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा उसका एकलौता बेटा अगर बलि चढ़ जाएगा तो बुढ़िया का क्या होगा, ये सोच-सोच वह परेशान हो गई। और उसने सकट की सुपारी और दूब देकर बेटे से बोला, ‘जा बेटा, सकट माता तुम्हारी रक्षा करेगी, और खुद सकट माता का स्मरण कर उनसे अपने बेटे की सलामती की दुआ मांगने लगी। अगली सुबह कुम्हार ने देखा की आवा भी पक गया और बालक भी पूरी तरह से सुरक्षित है और फिर सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक जिनकी बलि दी गई थी, वह सभी भी जी उठें, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी दिन से सकट चौथ के दिन मां अपने बेटे की लंबी उम्र के लिए भगवान गणेश की पूजा कर व्रत करने लगी ।

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