किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी मिले: अशोक बालियान


 मुजफ्फरनगर । पीजेंट्स वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक बालियान ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कृषि उपज का न्यूनतम बिक्री मूल्य तय करने व किसान की विपणन सम्बन्धी समस्याओं को हल करने के सम्बन्ध में सुझाव दिये हैं। 

पत्र में लिखा गया है कि देश में किसानों का एक बड़ा पढा-लिखा तबका कृषि सुधारों की मांग पिछले काफी लंबे समय से कर रहा था, इस मांग पर केंद्र सरकार ने कृषि सुधार के लिए तीन कानून बनाये है, जिनका विपक्ष व कुछ किसान संगठन विरोध कर रहे है और इन तीनों बिलों को वापिस लेने की मांग कर रहे है।  

उन्होंने कहा कि किसान को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज को बेचने के लिये पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने, निर्बाध अंतर्राज्यीय  व्यापार, कृषि उत्पादों की ई-ट्रेडिंग के लिये एक रूपरेखा बनाने की दिशा में केंद्रीय विपणन कानून का निर्माण करने की आवश्यकता थी, जिनको इन सुधारों के द्वारा पूरा किया जा रहा है। कोई व्यापारी, कंपनी, बाजार और संगठन किसान की दहलीज या खेत तक आकर फसल के बेहतर दाम देना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है। कांट्रेक्ट फार्मिंग कानून पंजाब में वर्ष 2013 से लागू है।    

पत्र में कहा गया कि पिछले एक सप्ताह से भी अधिक समय से दिल्ली में कडाके की सर्दी में दिल्ली में डटे किसान आंदोलन में हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के हज़ारों किसानों के शामिल है। और केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई हल नही निकला है। भाकियू ने कुछ बेहतर सुझाव दिए है।   उन्होंने कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि देश के विभिन्न इलाकों में कई कृषि जिंसों की किसान को मिलने वाली कीमत अक्सर एमएसपी से कम रहती है। यही वजह है कि अब हर फसल के लिए एमएसपी की मांग उठ रही है।

उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धरा 3 के खंड 2(ग) की शक्तियों का प्रयोग करते हुए गन्ने से बनने वाली चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य तय किया था, उसी तरह केंद्र सरकार फल-सब्जी, दूध व अन्य मुख्य कृषि उपज का न्यूनतम बिक्री मूल्य घोषित कर सकती है। ताकि किसानों को कम कीमत और उसकी वजह से उपजी निराशा से उबारा जा सके। इस सम्बन्ध में पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के इस सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव है- 

1. किसानों की कृषि उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे कृषि उपज न बिके, इसके लिए गन्ने से बनने वाली चीनी की तरह अन्य सभी सरकारी खरीद न होने वाली मुख्य कृषि उपज, मुख्य फल-सब्जी व दूध आदि का न्यूनतम बिक्री मूल्य तय किया जाए। केंद्र सरकार की कृषि उपज खरीद व्यवस्था फसल आते ही शुरू हो जाए, यह भी सुनिश्चित किया जाए। 

2. राज्यों की मंडियों में सुधार लाने के लिए व कृषि सम्बन्धी अन्य समस्याओं के हल के लिए कृषि को संविधान की समवर्ती सूचि में शामिल किया जाए। क्योकि कृषि राज्यों का विषय है।  

3. कृषि क्षेत्र से संबंधित आँकड़ों को एकत्र करने के लिये एक एजेंसी की स्थापना की जाए। यह संस्था लाभार्थियों की पहचान, विपणन व् सब्सिडी के बेहतर लक्ष्यीकरण और नीति निर्माण में सहायक होगी।

4. राज्य सरकार बाजार में मूल्य गिरने या बढने पर ऐसी फसलों की खरीद बाजार हस्तक्षेप योजना के माध्यम से करती जो जल्द ही खराब होने लगती हैं। जैसे बागवानी फसलें व् फल और सब्जी आदि। राज्य सरकार एक निश्चित समय सीमा में ऐसी फसलों की खरीद करती है। लेकिन राज्यों की उदासीनता व केंद्र से देर से इजाजत मिलने के कारण किसानों को इसका सही लाभ नहीं मिलता है और वह अपनी फसल सस्ते में बेचने को मजबूर हो जाता है। इसलिए इस योजना को किसान हित में समय से व अनिवार्य रूप से कैसे चालू रखा जाए इसके लिए क़ानूनी उपाय किये जाए।

उन्होंने अनुरोध किया है कि किसानों को मिलने वाली कम कीमत की समस्या को दूर करने के लिए   उपरोक्त सुझावों पर विचार करने क कष्ट करें।

Comments

Popular posts from this blog

शुक्र बदल रहे हैं राशि : जानिए आपकी राशि पर प्रभाव

यूपी में 19 से जूनियर और 1 दिसंबर से प्राइमरी स्कूल खुलेंगे

यू पी में आड. इवन की तर्ज पर खुलेंगे बाजार, सरकार ने हाईकोर्ट में कहा