Friday, June 4, 2021

कोरोना से भी ज्यादा घातक है, धरती की कोख में बोया जा रहा जहर

मुजफ्फरनगर। जल प्रदूषण रोकने के तमाम अभियानों और दावों के बीच भूजल प्रदूषण करने वाले कारखाने बेलगाम हैं। भोपा रोड पर तो हालात भयावह हो चुके हैं। यहां तमाम पेपर मिलों द्वारा जमीन में छोडे जाने वाले दूषित पानी से जहर बोया जा रहा है। एक नलकूप से दूषित कैमिकल युक्त पानी निकलने की खबर से खलबली मची हैं।

जिले में उद्योगों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण का असर भूगर्भ जल पर पड रहा है। कैंसर और दूसरी घातक बीमारियां बांट रहेेेेेेेेेेे इस काम पर कोई लगाम नहीं हैं। कारखानों द्वारा जमीन में छोडा जा रहा दूषित जल और बाहर व अंदर पडे दूषित कचरे से होकर जमीन में समाने वाले पानी से धरती जहरीली हो रही है। भोपा रोड पर पेपर मिलों के कारण तो स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग की दिखावटी कार्रवाईयों का इन पर कोई असर नहीं है। मखियाली में जमीन से उगला जहरीला पानी बीमारियां बांट रहा है। काली नदी से लेकर जिले के औद्योगिक इलाकों में फैले नाले तक कैंसर जैसी बीमारी बांट रहे हैं।  70 के दशक में औद्योगिकीकरण ने गति पकड़ी। खेतों से अंधाधुंध पैदावार की स्पर्धा में बेहताशा कीटनाशकों एवं उर्वरकों का प्रयोग हुआ। नतीजा यह हुआ कि इस बेल्ट में न सिर्फ जलस्रोतों में जहर पहुंचा, बल्कि कीटनाशक बनाने वाले तमाम उद्योग भी पनप गए। पेपर मिलोें ने आग में घी का काम किया। पेपर मिलों, चीनी मिलों, केमिकल इंडस्ट्री व हजारों छोटी इकाइयों का कचरा काली नदी में सीधे गिराया जा रहा है। नदी में आक्सीजन खत्म होने से जलीय जीव गायब हुए। दर्जनों गांवों में कैंसर एवं पेट की असाध्य बीमारियां उभरीं। तमाम चेतावनियों के बावजूद इन उद्योगों पर कोई असर नहीं है। नेताओं को चंदा चाहिए और और अफसरों को धंधा चाहिए। कोई मरे तो मरे। दूषित जल के कारण लेड, क्रोमियम, कैडमियम, पारा, मालिब्डेनम, कापर, जिंक, आयरन, आर्सेनिक एवं फ्लोरायड की मात्रा नालों व काली नदी में पहुंच रही है। धरती कोख में पल रहा यह जहर एकदिन कोरोना से भी घातक साबित हो सकता है।

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