ओमप्रकाश घोड़ी वाले, जिनके नाम से थर्राते थे अंग्रेज भीः पुण्य तिथि पर विशेष


मुजफ्फरनगर। शहर के नामी ओमप्रकाश जी घोडी वाले एक ऐसी शख्सियत का नाम है, जिसे शहरवासी एक जनसेवक और निर्भीक छवि वाले व्यक्तित्व के रूप में जानते हैं। सेना में सेवा करते समय जंगे आजादी में उनके योगदान और आजादी के बाद अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बने ओमप्रकाश घोडी वालों के नाम से अंग्रेजी भी थर्राते थे। शहर के सुथराशाही की इस शख्सियत की दिलेरी के किस्से आज भी पुराने लोगों की जुबान पर रहते हैं। देश में जब आजादी के लिये जंग चल रही थी, तब 1942 में उन्होंने सेना में भर्ती ली। इस शर्त के साथ कि वे तब तक सेना में सेवा करेंगे, जब तक देश आजाद नहीं हो जाता। आजादी के बाद उन्होंने सेना से सेवानिवृत्ति लेते हुए समाज की सेवा में अपने जीवन को अर्पित कर दिया। हिन्दू, मुस्लिम भाईचारे की मिसाल रहे ओमप्रकाश घोडी वाले हमेशा अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनकर रहे। गरीबों की सेवा से लेकर महिलाओं और बच्चों पर जुल्म करने वालों के खिलाफ उनकी आवाज इतनी बुलन्द थी कि बदमाश भी उनके नाम से थर्राते थे। घुडसवारी के शौकीन और माहिर ओम प्रकाश घोडी वाले अपनी बग्गी या घोडी पर बैठकर निकलते थे तो वे शहर के वैय समाज की आन बान और शान का प्रतीक समझे जाते थे। घुडसवारी में अंग्रेज भी उनके सामने पानी भरते थे और कोई अंग्रेज घुडसवारी में उन्हें हरा नहीं सका। उनके पुत्र वरिष्ठ समाजसेवी एवं व्यापारी नेता सुशील कुमार सिल्लो और पौत्र युवा व्यापारी नेता विश्वदीप गोयल बिट्टू ने आज भी उनके इस शौक को जिंदा रखा हुआ है और उनकी स्मृति का प्रतीक घोडी आज भी इस परिवार का सदस्य है। सेना की उनकी वर्दी, मैडल और उनकी बंदूक भी परिवार के पास सुरक्षित है। 1920 में जन्में ओमप्रकाश घोडी वाले ने 15 दिसम्बर 2001 को दुनिया से विदा ली तो शहर का हर शख्स उनके विछोह में व्याकुल हो गया था। 

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