हम तो सरकार कू ढुंढण जा रे दिल्ली :राकेश टिकैत


 गाजियाबाद। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता चौ. राकेश टिकैत ने  कहा कि किसान दिल्ली घुम्मण जा रे अर वहां सरकार कू ढूढेंगे, आखिर सरकार है कहां? 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को लेकर दिल्ली जा रहे भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने गाजियाबाद में दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर घेराव डाल दिया है। राकेश टिकैत का कहना है कि वह हरियाणा और पंजाब के किसानों को बुराड़ी में दिए निरंकारी मैदान में जाकर नहीं बैठेंगे। वह जंतर मंतर पर जाकर धरना देना चाहते हैं। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने उन्हें यह इजाजत नहीं दी है।  राकेश टिकैत ने कहा, "हम लोग दिल्ली घूमने जाना चाहते हैं और वहां जाकर सरकार को तलाश करेंगे। आखिर यह सरकार है कहां?"

राकेश टिकैत ने आज रात यूपी गेट पर ही बिताने का फैसला किया है। उनका कहना है कि जब तक दिल्ली जंतर मंतर पर जाने की इजाजत नहीं मिलेगी वह यही डेरा डालकर पड़े रहेंगे। राकेश टिकैत ने कहा, "हम लोगों को बुराड़ी मैदान नहीं जाना है। हम दिल्ली में जंतर मंतर पर जाकर धरना देंगे। यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। इससे हमें कोई सरकार नहीं रोक सकती है। केंद्र की मोदी सरकार पूरी तरह तानाशाही कर रही है। दिल्ली देश की राजधानी है। वहां जाने और अपनी बात रखने का हर नागरिक को अधिकार है। दिल्ली जाने से कोई नहीं रोक सकता है।" राकेश टिकैत ने आगे कहा, "जब देश में चुनाव आते हैं तो कोरोना का संक्रमण खत्म हो जाता है। नरेंद्र मोदी और तमाम दूसरे नेता रैलिया करते हैं। लाखों लोगों की भीड़ जुटा लेते हैं। अब जब किसान अपनी बात लेकर दिल्ली जाना चाहता है तो यह लोग कोरोनावायरस का खतरा दिखाकर हमें रोकना चाहते हैं। चुनाव और इनके राजनीतिक दलों की गतिविधियों में कोरोनावायरस आड़े नहीं आता है। किसानों और आम आदमी के लोकतांत्रिक हकों को दबाने के लिए सरकार ने कोरोनावायरस के संक्रमण को अपनी ढाल बना रखा है।"



भारतीय किसान यूनियन हरियाणा और पंजाब के किसानों की तरह केंद्र सरकार की ओर से लाए गए कृषि कानूनों का विरोध कर रही है। इस बारे में राकेश टिकैत का कहना है, "सरकार सबसे पहले यह साफ कर दे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर देश के किसी भी कौने में कोई कृषि उत्पाद नहीं बिकेगा। अगर कोई व्यापारी या कारोबारी सरकार की ओर से निर्धारित एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उत्पाद खरीदेगा तो उसके खिलाफ सरकार क्या कार्रवाई करेगी? जब सरकार खुले बाजार में कृषि उत्पाद की खरीद खरीद-फरोख्त को बढ़ावा देना चाहती है तो कारोबारी और उद्योगपति के उत्पादन की तरह कृषि उत्पादन का भी एमआरपी तय किया जाना चाहिए। नहीं तो सरकार किसानों को अपने कृषि उत्पादों का एमआरपी खुद तय करने का अधिकार दे दे।"

सरकार कह रही है कि आंदोलन करने वाले लोग किसान नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से इस आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। इस पर राकेश टिकैत ने कहा, "मैं और मेरे साथ आए लोग किसान हैं या नहीं, इस बात का सरकार पता लगा ले। हमारे पूर्वजों की 10 पीढ़ियां किसान थीं या नहीं, यह भी पता कर लिया जाए। पंजाब और हरियाणा से आ रहे हजारों-लाखों किसानों के बारे में सरकार पता कर सकती है। यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए पता करना कौन सी बड़ी बात है। सरकार किसान को बदनाम करना चाहती है। इस देश में किसान को भगवान कहा जाता है। सरकार किसान से यह दर्जा छीनना चाहती है। जिससे कि आम आदमी की सहानुभूति और संवेदनशीलता किसानों के प्रति समाप्त हो जाए। सरकार को अपनी मनमानी करने की पूरी छूट मिल जाए। इस सरकार का सामान्य तरीका है, लोगों को देशद्रोही और राजनीतिक साजिश करने वाला करार दे दिया जाए।"

आप लोगों की सरकार से आखिर मांग क्या है और यह आंदोलन कैसे समाप्ति की ओर बढ़ेगा? इस सवाल के जवाब में राकेश टिकैत ने कहा, "केंद्र सरकार अपने कानूनों पर विचार करें। किसानों को संरक्षण और सुरक्षा का पूरा भरोसा दे। किसान के उत्पाद पर व्यापारी और कारोबारी डाका ना डाल पाएं। सरकार खुले दिल से किसानों के साथ बातचीत करे। सरकार को जो बातचीत यह कानून पास करने से पहले किसानों से करनी चाहिए थी, कम से कम अब कर ले। देश में लोकतंत्र है। सरकार को लोकतंत्र का सम्मान करना चाहिए। हम लोगों को दिल्ली आने से नहीं रोका जाए। दिल्ली किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी की नहीं है। दिल्ली देश के हर नागरिक की है। किसान को अपनी और अपनी पीढ़ियों की सुरक्षा का भरोसा चाहिए। हमें और किसी से कुछ मांगने की जरूरत नहीं है।" 

उन्होंने आखिर में कहा, "यह सरकार तो किसानों की आय दोगुनी करने का दावा करती घूम रही थी। आज देखिए हमें बेघर करने पर उतारू है। हमारे हाथ से खेती-बाड़ी और हमारे पूर्वजों की दी हुई विरासत छीनने पर आमादा है। कोई तो यह काम चोरी-छिपे करता है, यह सरकार बाकायदा कानून बनाकर हमारे घरों में डाका डालना चाह रही है। सरकार अपनी इस मानसिकता को बदल ले तो किसान को कोई गिला शिकवा नहीं है। हम दिल्ली घूमने आए हैं। साथ ही इस सरकार को भी तलाश करेंगे। पता लगाएंगे कि आखिर सरकार बैठी कहां है।"

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