कृषि कानूनों में किसान विरोधी कुछ नहीं हैः अशोक बालियान

 


मुजफ्फरनगर। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के संयोजक अशोक बालियान ने कहा कि केंद्र सरकार के तीनों कृषि सुधार कानून किसानों के खिलाफ नहीं बल्कि यह उनकी उन्नति के लिए हैं।

आज एक बयान में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कृषि सुधार के लिए दो कानून बनाये है और एक कानून में संशोधन किया है। सरकार द्वारा बनाये गये कानून में हमेशा सुधार या बदलाव की जरूरत समय के अनुसार पड़ती रही है।  पिछले दो माह से केंद्र सरकार आंदोलनरत किसान नेताओं व् विपक्ष से पूछ रही है इन कानूनों में किसान के विरुद्ध कौन-कौन से प्रावधान है हम उनके संशोधन पर विचार करने के लिए तैयार है, लेकिन आंदोलनरत किसान नेताओं ने अभी तक यह नही बताया कि इन कानूनों में किसान के विरुद्ध कौन-कौन से प्रावधान है।  इन कानूनों के आने के बाद सितंबर 2020 के पंजाब बंद के आह्वान की कमान सबसे पहले वहाँ के आढ़तियों ने संभाली थी,क्योकि इन कानूनों में यह प्रावधान किया गया है कि किसानों से फसल की सीधी खरीद मंडियों के बाहर भी की जा सकती है और उस पर कोई भी टैक्स या कमीशन नहीं लिया जाएगा। 

अशोक बालियान ने कहा कि पंजाब व हरियाणा राज्य के अधिकतर किसान आढ़तियों से कर्ज लेते है और इसी जाल में फसें रहते है। इसलिए यहाँ के आढती पुरानी व्यवस्था ही बनी रहना देना चाहते है। जबकि उत्तरप्रदेश राज्य में किसानों आढ़तियों के कर्ज के जाल में नही है। इसलिए उत्तरप्रदेश के आढ़तियों पर इन तीनों कानूनों का कोई विपरीत प्रभाव नही पढ़ रहा है।   पहला कानून कृषि उपज व्र्या पार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम 2020  के सेक्शन 3 में देश किसानों को उसके खेत में या कहीं भी जहाँ उसे बेहतर मूल्य मिले अर्थात कृषि उत्पादन एवं विपणन समिति (मंडी समिति) के अलावा बेचने का एक विकल्प दिया है।   इस कानून के सेक्शन 6 में कृषि उपज बेचने पर कोई मंडी टैक्स व् आडत नही देनी पड़ती है, जबकि मंडी जो राज्यों के आधीन है वहाँ बेचने पर किसान को मंडी टैक्स व आढत देनी होती है। मंडी के व्यापरियों व मंडी के व्यापारियों व्यापारियों द्वारा एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने से किसान को लाभ होगा।    

    दूसरा कानून किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) अनुबंध मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम 2020 अर्थात काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून 2020 के सेक्शन 5 के माध्यम से देश का किसान अनुबंध कृकृषि के द्वारा बोई जाने वाली कृषि उपज का सर्वोत्तम मूल्य ले सकते है। इस कानून के सेक्शन 6 (2) स्पष्ट है कि किसान की कृषि उपज को खेत में देखने के बाद व्यापारी लेने से मना नही कर सकता। इस कानून के सेक्शन 7 स्पष्ट है कि किसान को कोई मंडी टैक्स व आढ़त नही देनी पड़ेगी। इस कानून के सेक्शन 8 स्पष्ट है कि किसान की केवल फसल का ही अनुबंध होगा, जमीन का नही व् सेक्शन 9 में स्पष्ट है कि फसल नष्ट होने का जोखिम व्यापारी द्वारा किये गये बीमे आदि से भी कवर होगा और किसान को उसकी उपज का रुपया मिलेगा।  इस कानून के सेक्शन 15 में स्पष्ट है कि किसान पर यदि कोई देनदारी निकलती है तो उसकी जमीन से वसूली नही होगी। जबकि व्यापरी पर कोई देनदारी निकलने निकलती है तो उसकी जमीन से वसूली होगी।

 तीसरा कानून  आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन किया है इस कानून के सेक्शन 2 (क) के द्वारा अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तु की सूची से हटा दिया गया है। और इन वस्तुओं के स्टाक की सीमा को भी हटा दिया गया है।  इस कानून के सेक्शन 2 (ख) के द्वारा इन पांचों वस्तुओं का अत्यधिक मूल्य बढने पर को पुनरू आवश्यक वस्तु की सूची में शामिल कर लिया जाएगा। और इन वस्तुओं के स्टाक की सीमा को बांध दिया जाएगा।  इस बदलाव से निजी निवेश बढ़ेगा, फल-फूल व् सब्जियों की सप्लाई चेन बेहतर होगी और फूड प्रोसिशिंग खराबी बंद होगी।और किसान किसी प्रकार के शोषण के बिना  खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, बड़े खुदरा विक्रेताओं व् निर्यातकों आदि से समान स्तर पर जुड़ने के लिए सशक्त होंगे। बाजार में कालाबाजारी और जमाखोरी तब होती है जब किसी चीज की कमी (सार्टेज) हो, अब जमाखोरी क्यों होगी? इससे निजी निवेश बढ़ेगा। कृषि में निवेश बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। कृषि में रिफार्म होने से निवेश गांव के नजदीक पहुंच जाएगा। जिसका किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।

पहले से पंजाब में लागू है कांटेªक्ट फार्मिंग

मुजफ्फरनगर। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन का सार्वजनिक तौर पर पंजाब के किसान नेताओं से सवाल किया है कि जिस ‘काॅन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून’ का आन्दोलन कर रहे किसान नेता विरोध कर रहे है  वह ‘एक्ट’ तो पंजाब में 2013 से लागू है!  इसका विरोध क्यों नहीं किया गया। पंजाब सरकार के “काॅन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून 2013  में काॅन्ट्रैक्ट फार्मिंग का उल्लंघन करने वाले किसानों को जेल में भेजने व पांच लाख जुर्माने का प्रावधान है। जबकि केंद्र के कानून में यह प्रावधान नहीं है, लेकिन फिर भी ये आंदोलनरत किसान नेता केंद्र के ही  काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून 2020  का विरोध कर रहे है, क्या इन मुद्दों को समझने की जरूरत नहीं महसूस की जा रही है।

 देश में विपक्षी नेताओं व पंजाब के कुछ किसान नेताओं द्वारा कृषि कानून के नाम पर किसानों  को भड़काया जा रहा है। और इन किसान नेताओं द्वारा झूठ बोलकर कहा जा रहा है कि किसानों की जमीन चली जाएगी। जबकि  काॅन्ट्रेक्ट फार्मिंग कानून 2020  का कोई भी प्रावधान यह नहीं कहता। इन कानूनों से किसानों को महंगी फसलें उगाने का अवसर मिलेगा। खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान अब वो  केंद्र सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के सेक्शन 3 को लागू कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसान की उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर न बिके। और कृषि उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते समय डाॅ स्वामीनाथन की रिपोर्ट में कृषि उपज लागत में सी2 के प्रावधान को जोड़कर तय करना चाहिए।  हम आंदोलनरत पंजाब के किसान नेताओं से अपील करते है कि वे केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधार के लिए बनाये गये दो कानूनों व् संशोधित किये गये एक कानून को पढ़े और फिर उनके किसी प्रावधान में कोई कमी लगती हो तो उसके संशोधन पर सरकार से वार्ता करे, क्योकि ये कानून किसानों को बेहतर विकल्प देने वाले कानून है। क्योकि ये कानून पूरी तरह से किसानों के हित में है और इन्हें वापस लेने की मांग का मतलब किसानों की उन्नति को रो कना है।

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